
बिलासपुर, बिल्हा
बिलासपुर जिले के बिल्हा में कलेक्टर संजय अग्रवाल के सख्त फरमान सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह गए हैं। वाटर हार्वेस्टिंग के नाम पर बिना अनुमति, बिना पटवारी प्रतिवेदन, बिना बैंक चालान और बिना नक्शा पास कराए खुलेआम अवैध बोर का खेल चल रहा है। सिस्टम की मिलीभगत से कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
मुख्य बिंदु: सिस्टम की पोल खोलते सच
बिल्हा तहसीलदार की कार्यशैली कटघरे में: सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना तहसीलदार और एसडीएम की शह के रात के अंधेरे में अवैध बोर उत्खनन मुमकिन कैसे?
सूचना के बाद भी सन्नाटा: सूचना देने के बाद भी प्रशासन का मौन रहना सबसे बड़ा सस्पेंस है। आखिर कार्रवाई से परहेज क्यों?
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे: कलेक्टर के आदेशों की खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं। जो भी अवैध बोर की सूचना देता है, अफसर उसे ही झूठा साबित कर पल्ला झाड़ लेते हैं – “मौके पर कुछ नहीं मिला”।
सबूतों का अंबार, फिर भी आंखें बंद: पत्रकारों के पास हर अवैध खनन का वीडियो फुटेज, फोटो और गाड़ी नंबर तक मौजूद है, फिर भी सिस्टम सोया हुआ है।
अफसरों को ललकार, पत्रकारों को धमकी:
बोरवेल माफिया का हौसला इतना बुलंद है कि SDM-तहसीलदार को ‘तुम सब मेरा उखाड़ लोगे’ जैसी चुनौती दे रहा है और पत्रकारों को जान से मारने की धमकी दी जा रही है।
पत्रकारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी: अगर इस केस से जुड़े किसी भी पत्रकार के साथ रोड दुर्घटना, कोई भी संदिग्ध हादसा या मौत होती है, तो इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी महामाया बोरवेल्स से जुड़ी कंपनी और गुरु कृपा बोरवेल की होगी। पत्रकारों को पहले ही जान से मारने की धमकी मिल चुकी है।
21 मई 2026 को महामाया बोरवेल्स की गाड़ी जब्त: दिनांक 21/5/2026 को महामाया बोरवेल्स की गाड़ी तिफरा ओवर ब्रिज के पास से जब्त की गई है। सिरगिट्टी थाना प्रभारी ने एसडीएम और तहसीलदार की मौजूदगी में कार्रवाई की है। यही महामाया बोरवेल्स की गाड़ी है जो बिल्हा क्षेत्र में धाक जमाए बैठी है।
पहली घटना: महामाया बोरवेल्स से जुड़ी कंपनी के मैनेजर की गुस्ताखी
सूत्रों के मुताबिक, बिल्हा क्षेत्र की महामाया बोरवेल्स से जुड़ी एक बोरवेल कंपनी के मैनेजर संतोष यादव ने एसडीएम और तहसीलदार से अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए खुली चुनौती दी – ‘तुम सब मेरा उखाड़ लोगे’। यह कलेक्टर के आदेशों पर सीधा प्रहार है और प्रशासन के मुंह पर तमाचा है।
दूसरी घटना: 22 मई 2026 की रात – कानून को चुनौती
22 मई 2026 की रात बिल्हा हॉस्पिटल के सामने, रजिस्ट्रार ऑफिस के बगल स्थित कॉलोनी में अवैध बोर खनन की सूचना तहसीलदार को दी गई। जवाब मिला “70 फीट की अनुमति है”, जबकि मौके पर पूरी बोर जमीन फाड़ चुकी थी। ‘गुरु कृपा बोरवेल’ की गाड़ी से खेल हुआ। सच उजागर करने पर पत्रकारों को जान से मारने की धमकी मिली।
सिस्टम से सीधे सवाल:
बिना तहसीलदार-एसडीएम की मौन सहमति के रातोंरात बोर खोदना नामुमकिन है। सूचना के बाद भी कार्रवाई न होना और सूचना देने वाले को ही झूठा करार देना, किस बड़े खेल की ओर इशारा है? कलेक्टर को सबूत देने के बाद भी “कुछ नहीं मिला” का रटा-रटाया जवाब क्यों?
प्रशासन से दो टूक मांग
बिल्हा तहसीलदार की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो – मिलीभगत बेनकाब हो।
महामाया बोरवेल्स से जुड़ी कंपनी के मैनेजर संतोष यादव पर अफसरों को धमकाने का केस दर्ज हो।
22 मई की रात हुई खुदाई की वीडियोग्राफी के साथ नापजोख हो और गुरु कृपा बोरवेल के सारे कागज खंगाले जाएं।
पत्रकारों को धमकाने वाले माफिया को तत्काल गिरफ्तार किया जाए।
पत्रकारों के पास मौजूद वीडियो, फोटो और गाड़ी नंबर के आधार पर CBI या स्वतंत्र एजेंसी से जांच हो।
इस केस को कवर कर रहे सभी पत्रकारों को तत्काल पुलिस सुरक्षा दी जाए।
अब देखना यह है कि शासन-प्रशासन क्या कार्रवाई करता है:
पत्रकारिता को देश का चौथा स्तंभ कहा जाता है। अगर सच उजागर करने पर कलम को कुचलने की कोशिश होगी, आवाज को धमकी से दबाया जाएगा, तो लोकतंत्र का ये स्तंभ कमजोर होगा। सवाल सिर्फ एक बोर का नहीं, सिस्टम की साख का है।
अब गेंद प्रशासन के पाले में है। कलेक्टर संजय अग्रवाल के आदेशों को रौंदा जा रहा है, सूचना देने वालों को झूठा बताया जा रहा है और सबूतों को कूड़ेदान में फेंका जा रहा है। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई और किसी पत्रकार के साथ अनहोनी हुई तो सीधे तौर पर महामाया बोरवेल्स और गुरु कृपा बोरवेल जिम्मेदार होंगे। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो यह मान लिया जाएगा कि बिल्हा में कानून नहीं, माफियाराज चलता है।
जनता देख रही है, कैमरा ऑन है, और कलम अभी टूटी नहीं है।
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