मोपका नाबालिग छेड़छाड़ मामले में नया विवाद: पुलिस पर आरोप लगाने वाले अधिवक्ता की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

पुलिस ने नाबालिग की शिकायत पर की कार्रवाई, आरोपी गिरफ्तार; पुराने सिरगिट्टी मामले में हाईकोर्ट पहले ही पांच लोगों की FIR कर चुका है क्वैश
बिलासपुर/मोपका, 12 अगस्त 2026।
मोपका क्षेत्र में 14 वर्षीय नाबालिग से कथित छेड़छाड़ और लगातार पीछा करने के मामले में पुलिस द्वारा आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेजे जाने के बाद अब मामला एक नए विवाद में घिर गया है। नाबालिग के परिवार की शिकायत पर कार्रवाई करने वाली पुलिस पर ही सवाल उठाए जाने के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली और अधिवक्ता की भूमिका को लेकर बहस तेज हो गई है।
परिवार की शिकायत के आधार पर मोपका पुलिस ने अपराध क्रमांक 1139/2026 दर्ज कर BNS की धारा 78, 79 तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 12 के तहत कार्रवाई की। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर 9 अगस्त 2026 को न्यायिक रिमांड पर भेज दिया।
शिकायत पर तत्काल कार्रवाई, फिर पुलिस पर सवाल क्यों?
नाबालिग के पिता की शिकायत के अनुसार उनकी 14 वर्षीय बेटी का करीब दो महीने से पीछा किया जा रहा था और उसे कथित रूप से परेशान किया जा रहा था। परिवार का आरोप है कि कई बार समझाइश देने के बावजूद स्थिति नहीं बदली, जिसके बाद बच्ची भयभीत हो गई और स्कूल जाने से भी इनकार कर दिया।
शिकायत सामने आने के बाद मोपका पुलिस ने मामले में कार्रवाई की और आरोपी को गिरफ्तार किया। ऐसे में पुलिस का कहना है कि उसने शिकायत पर कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की है।
इसके बावजूद मामले से जुड़े एक अधिवक्ता की ओर से पुलिस अधिकारी पर आरोप लगाए जाने के बाद सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या पुलिस की कार्रवाई को गलत ठहराने से पहले पूरे घटनाक्रम और दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच नहीं होनी चाहिए?
पुराने सिरगिट्टी मामले ने बढ़ाई चर्चा
मामले में अब थाना सिरगिट्टी के क्राइम नंबर 624/2024 का हाईकोर्ट आदेश भी चर्चा में आ गया है।
इस मामले में सुमन यादव, इंदु चंद्रा, नंद राठौर, मोहम्मद इस्लाम और राहुल जायसवाल के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। आरोपों को लेकर मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां 12 फरवरी 2026 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पांचों याचिकाकर्ताओं के संबंध में FIR क्वैश कर दी।
हाईकोर्ट के आदेश में दर्ज तथ्यों के अनुसार याचिकाकर्ताओं की ओर से FIR में देरी, पूर्व शिकायतों, 112 पर की गई सूचना और CCTV सहित विभिन्न सामग्री का हवाला दिया गया था। राज्य की ओर से जांच, मेडिकल परीक्षण, CCTV फुटेज तथा चार्जशीट दाखिल होने की जानकारी दी गई थी।
सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर माना कि आरोपों को प्रथम दृष्टया स्वीकार करने पर भी याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आरोपित अपराधों के आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं होते। कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना और संबंधित पांचों याचिकाकर्ताओं के खिलाफ FIR क्वैश कर दी।
क्या पद और कानून की जानकारी का हो रहा है इस्तेमाल?
अब इसी पुराने मामले और वर्तमान मोपका प्रकरण को लेकर यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या अधिवक्ता के पद और कानूनी जानकारी का इस्तेमाल पुलिस कार्रवाई पर अनावश्यक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है?
यदि किसी अधिवक्ता द्वारा पुलिस अधिकारी पर लगाए गए आरोप तथ्यहीन पाए जाते हैं, तो यह गंभीर विषय होगा। वहीं यदि आरोपों के समर्थन में ठोस साक्ष्य हैं, तो उनकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
किसी भी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं है। लेकिन यदि एक ही पक्ष से जुड़े मामलों में बार-बार विवादित शिकायतें सामने आ रही हैं और पुराने मामले में हाईकोर्ट द्वारा FIR क्वैश की जा चुकी है, तो पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
नाबालिग की सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता
इस पूरे विवाद के बीच सबसे महत्वपूर्ण विषय 14 वर्षीय नाबालिग बच्ची की सुरक्षा है। पुलिस द्वारा आरोपी को गिरफ्तार किया जाना कानून के तहत की गई कार्रवाई है, जबकि आगे की न्यायिक प्रक्रिया में आरोपों की वास्तविकता तय होगी।
वहीं पुलिस अधिकारी पर लगाए गए आरोपों की भी यदि शिकायत की जाती है तो उनकी जांच सक्षम स्तर पर होनी चाहिए, ताकि न तो किसी निर्दोष पुलिस अधिकारी की छवि खराब हो और न ही किसी वास्तविक शिकायत को दबाया जाए।
बड़ा सवाल
अब सवाल यह है कि—
क्या नाबालिग की शिकायत पर कार्रवाई करने वाली पुलिस को बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है?
क्या पुराने सिरगिट्टी मामले में हाईकोर्ट द्वारा FIR क्वैश किए जाने के बाद भी उसी तरह के आरोपों को आधार बनाया जा रहा है?
क्या अधिवक्ता अपने पेशे और कानूनी प्रभाव का इस्तेमाल पुलिस पर दबाव बनाने के लिए कर रहे हैं?
इन सभी सवालों का जवाब दस्तावेजी साक्ष्यों और निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा।
फिलहाल मोपका पुलिस की कार्रवाई के बाद विवाद का नया केंद्र पुलिस नहीं, बल्कि पुलिस पर लगाए जा रहे आरोपों की सत्यता और उन्हें लगाने वाले पक्ष की भूमिका बन गई है।
नोट: इस खबर में अधिवक्ता के संबंध में उल्लेखित बातें आरोप/दावों के रूप में हैं। किसी आरोप को न्यायालय द्वारा सिद्ध किए जाने से पहले उसे अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। सिरगिट्टी क्राइम नंबर 624/2024 के संबंध में हाईकोर्ट का आदेश उपलब्ध दस्तावेज के आधार पर उद्धृत किया गया है।
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